श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.36.9 
अभ्यसूयन्ति सततं परस्परममित्रवत् ।
ततोऽहं तप आतिष्ठं नैतान् पश्येयमित्युत॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वे शत्रुओं के समान सदैव एक-दूसरे में दोष ढूंढ़ते रहते हैं। इससे तंग आकर मैंने तपस्या आरम्भ कर दी है, जिससे मैं उन्हें देख न सकूँ॥9॥
 
They always find faults with each other like enemies. Tired of this, I have started doing penance so that I cannot see them.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)