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mahabharat 1.36.7: 'अनघ! इस घोर तप से तुम सम्पूर्ण जनता को कष्ट दे रहे हो। शेषनाग! तुम्हारे हृदय में जो भी इच्छा हो, उसे मुझसे कहो।'॥7॥   |   mahabharat अध्याय 1.36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 36: शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.36.7 
त्वं हि तीव्रेण तपसा प्रजास्तापयसेऽनघ।
ब्रूहि कामं च मे शेष यस्ते हृदि व्यवस्थित:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'अनघ! इस घोर तप से तुम सम्पूर्ण जनता को कष्ट दे रहे हो। शेषनाग! तुम्हारे हृदय में जो भी इच्छा हो, उसे मुझसे कहो।'॥7॥
 
'Anagh! By this intense penance you are tormenting the entire public. Sheshnag! Tell me whatever desire you have in your heart.'॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)