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mahabharat 1.34.23: तब यह सोचकर कि वहाँ अमृत रखा है, अतः सम्भव है कि उसमें कुछ हो, सर्प कुशा चाटने लगे। ऐसा करने से सर्पों की जीभ दो भागों में विभक्त हो गई॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 1.34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 34: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.34.23 
सोमस्थानमिदं चेति दर्भांस्ते लिलिहुस्तदा।
ततो द्विधाकृता जिह्वा: सर्पाणां तेन कर्मणा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
तब यह सोचकर कि वहाँ अमृत रखा है, अतः सम्भव है कि उसमें कुछ हो, सर्प कुशा चाटने लगे। ऐसा करने से सर्पों की जीभ दो भागों में विभक्त हो गई॥ 23॥
 
Then thinking that nectar had been kept there and hence it is possible that some of it might be there, the snakes started licking the kusha grass. By doing this the tongue of the snakes got divided into two parts.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)