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mahabharat 1.33.9-10: आकाश में विचरण करते हुए महाबली विनतापुत्र ने बड़े जोर से आक्रमण करके दोनों सर्पों के शरीर दो-दो टुकड़े कर दिए; फिर वह अमृत की ओर झपटा, चक्र तोड़ डाला, अमृत का कलश उठा लिया और बड़े वेग से वहाँ से उड़ गया।   |   mahabharat अध्याय 1.33: गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 33: गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.33.9-10 
तयोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेयोऽन्तरिक्षग:।
आच्छिनत् तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत् तत:॥ ९॥
समुत्पाटॺामृतं तत्र वैनतेयस्ततो बली।
उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
आकाश में विचरण करते हुए महाबली विनतापुत्र ने बड़े जोर से आक्रमण करके दोनों सर्पों के शरीर दो-दो टुकड़े कर दिए; फिर वह अमृत की ओर झपटा, चक्र तोड़ डाला, अमृत का कलश उठा लिया और बड़े वेग से वहाँ से उड़ गया।
 
The mighty son of Vinata, roaming in the sky, attacked with great force and cut the bodies of both the serpents in two; then he rushed towards the nectar, broke the discus, picked up the vessel of nectar and flew away from there with great speed. 9-10.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)