Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.33.7: उनकी आँखें सदैव क्रोध से भरी रहती थीं। वे निरंतर किसी न किसी को देखते रहते थे (उनकी आँखें कभी बंद नहीं होती थीं)। जो कोई उनमें से किसी एक को भी देख लेता, वह तुरंत भस्म हो जाता था ॥7॥ | mahabharat अध्याय 1.33: गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र-प्रहार । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सदा संरब्धनयनौ सदा चानिमिषेक्षणौ।
तयोरेकोऽपि यं पश्येत् स तूर्णं भस्मसाद् भवेत्॥ ७॥
अनुवाद
उनकी आँखें सदैव क्रोध से भरी रहती थीं। वे निरंतर किसी न किसी को देखते रहते थे (उनकी आँखें कभी बंद नहीं होती थीं)। जो कोई उनमें से किसी एक को भी देख लेता, वह तुरंत भस्म हो जाता था ॥7॥
Their eyes were always filled with anger. They used to gaze at someone continuously (their eyes never closed). Anyone who looked at even one of them could be instantly reduced to ashes. ॥ 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥