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mahabharat 1.30.52: इस प्रकार उस महायुद्ध के लिए महाप्रतापी देवता तैयार खड़े थे। वह रणभूमि लाखों परिघ आदि अस्त्र-शस्त्रों से युक्त, सूर्य की किरणों से प्रकाशित तथा टूटकर गिरे हुए दूसरे आकाश के समान शोभायमान थी।   |   mahabharat अध्याय 1.30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.30.52 
इति समरवरं सुरा: स्थितास्ते
परिघसहस्रशतै: समाकुलम्।
विगलितमिव चाम्बरान्तरं
तपनमरीचिविकाशितं बभासे॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उस महायुद्ध के लिए महाप्रतापी देवता तैयार खड़े थे। वह रणभूमि लाखों परिघ आदि अस्त्र-शस्त्रों से युक्त, सूर्य की किरणों से प्रकाशित तथा टूटकर गिरे हुए दूसरे आकाश के समान शोभायमान थी।
 
Thus, the illustrious gods were standing ready for that great battle. That battlefield was filled with millions of weapons like Parigha etc. and was lit up by the rays of the sun and was looking beautiful like a second sky that had broken and fallen.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रिंशोऽध्याय:॥ ३०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)