श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.30.44 
युष्मान् सम्बोधयाम्येष यथा न स हरेद् बलात्।
अतुलं हि बलं तस्य बृहस्पतिरुवाच ह॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हें इसलिए सावधान करता हूँ कि वे बलपूर्वक इस अमृत को न ले जा सकें। बृहस्पतिजी ने कहा है कि उनका बल अतुलनीय है।'॥44॥
 
'I warn you so that they cannot take away this nectar by force. Brihaspatiji has said that their strength is incomparable.'॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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