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mahabharat 1.30.39: इन्द्र ने पूछा - हे प्रभु! ये भयंकर विपत्तियाँ एकाएक क्यों आ रही हैं? मुझे ऐसा कोई शत्रु नहीं दिखाई देता जो युद्ध में हम देवताओं का अपमान कर सके। 39.   |   mahabharat अध्याय 1.30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.30.39 
इन्द्र उवाच
किमर्थं भगवन् घोरा उत्पाता: सहसोत्थिता:।
न च शत्रुं प्रपश्यामि युधि यो न: प्रधर्षयेत्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने पूछा - हे प्रभु! ये भयंकर विपत्तियाँ एकाएक क्यों आ रही हैं? मुझे ऐसा कोई शत्रु नहीं दिखाई देता जो युद्ध में हम देवताओं का अपमान कर सके। 39.
 
Indra asked - O Lord! Why are these terrible calamities taking place all of a sudden? I do not see any enemy who can insult us gods in the war. 39.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)