Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.30.12: उनका स्वरूप ऐसा था कि उसकी कल्पना या ध्यान नहीं किया जा सकता था। वे समस्त प्राणियों को भयभीत कर रहे थे। उनमें महान पराक्रम था। वे अत्यंत भयंकर प्रतीत हो रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं अग्निदेव उनके रूप में प्रकट हो गए हों॥12॥ | mahabharat अध्याय 1.30: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उनका स्वरूप ऐसा था कि उसकी कल्पना या ध्यान नहीं किया जा सकता था। वे समस्त प्राणियों को भयभीत कर रहे थे। उनमें महान पराक्रम था। वे अत्यंत भयंकर प्रतीत हो रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं अग्निदेव उनके रूप में प्रकट हो गए हों॥12॥
His form was such that it could not be imagined or meditated upon. He was creating fear for all living beings. He had great valour within him. He appeared very fearsome. It seemed as if Agnidev himself had appeared in his form.॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥