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mahabharat 1.3.90: गुरु के ऐसा कहने पर उत्तंक ने कहा - 'प्रभो! आपके प्रिय कार्यों में से मुझे कौन सा कार्य करना चाहिए? वृद्धजन भी ऐसा ही कहते हैं ॥90॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  1.3.90 
स एवमुक्त: प्रत्युवाच किं ते प्रियं करवाणीति, एवमाहु:॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
गुरु के ऐसा कहने पर उत्तंक ने कहा - 'प्रभो! आपके प्रिय कार्यों में से मुझे कौन सा कार्य करना चाहिए? वृद्धजन भी ऐसा ही कहते हैं ॥90॥
 
When the Guru said this, Uttanka said, 'Lord! Which of your favourite tasks should I perform? The old people also say so.॥ 90॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)