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mahabharat 1.3.26: शिष्यों ने उत्तर दिया - 'भगवन्! आपने ही तो उसे यह कहकर भेजा था कि 'जाओ और पुष्पशाला के टूटे हुए तटबंध की मरम्मत करो।' शिष्यों की यह बात सुनकर उपाध्याय ने उनसे कहा - 'तो फिर हम सब उस स्थान पर चलें जहाँ आरुणि गया है।'॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.3.26 
ते तं प्रत्यूचुर्भगवंस्त्वयैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं बधानेति। स एवमुक्तस्ताञ्छिष्यान् प्रत्युवाच तस्मात् तत्र सर्वे गच्छामो यत्र स गत इति॥ २६॥
 
 
अनुवाद
शिष्यों ने उत्तर दिया - 'भगवन्! आपने ही तो उसे यह कहकर भेजा था कि 'जाओ और पुष्पशाला के टूटे हुए तटबंध की मरम्मत करो।' शिष्यों की यह बात सुनकर उपाध्याय ने उनसे कहा - 'तो फिर हम सब उस स्थान पर चलें जहाँ आरुणि गया है।'॥ 26॥
 
The disciples replied, 'Lord! You yourself had sent him saying, 'Go and repair the broken embankment of the flowerbed.' On hearing this from the disciples, the Upadhyaya said to them, 'Then let us all go to the place where Aruni has gone.'॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)