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mahabharat 1.3.180: यद्यपि तुम्हारे पिता महाराज परीक्षित ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी उस दुष्ट सर्प ने उन्हें डस लिया और वे वज्र से घायल वृक्ष की भाँति तुरन्त गिरकर मृत्यु के मुख में चले गये।   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  1.3.180 
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना।
पञ्चत्वमगमद् राजा वज्राहत इव द्रुम:॥ १८०॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि तुम्हारे पिता महाराज परीक्षित ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी उस दुष्ट सर्प ने उन्हें डस लिया और वे वज्र से घायल वृक्ष की भाँति तुरन्त गिरकर मृत्यु के मुख में चले गये।
 
Although your father Maharaja Parikshit had not committed any crime, yet that evil serpent bit him and like a tree struck by thunderbolt he immediately fell down and went to the jaws of death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)