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mahabharat 1.3.164: जाते समय रास्ते में मुझे एक बैल दिखाई दिया, जिस पर एक मनुष्य सवार था। उस मनुष्य ने मुझसे आग्रहपूर्वक कहा - 'उत्तंक! इस बैल का गोबर खाओ। तुम्हारे उपाध्याय भी इसे पहले खा चुके हैं।'॥164॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  1.3.164 
पथि गच्छता च मया ऋषभो दृष्टस्तं च पुरुषोऽधिरूढस्तेनास्मि सोपचारमुक्त उत्तङ्कास्य ऋषभस्य पुरीषं भक्षय उपाध्यायेनापि ते भक्षितमिति॥ १६४॥
 
 
अनुवाद
जाते समय रास्ते में मुझे एक बैल दिखाई दिया, जिस पर एक मनुष्य सवार था। उस मनुष्य ने मुझसे आग्रहपूर्वक कहा - 'उत्तंक! इस बैल का गोबर खाओ। तुम्हारे उपाध्याय भी इसे पहले खा चुके हैं।'॥164॥
 
While passing by, I saw a bull on the way, a man was riding on it. That man said to me with insistence - 'Uttank! Eat the dung of this bull. Your Upadhyaya has also eaten it earlier.'॥ 164॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)