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mahabharat 1.3.160: तत्पश्चात् उत्तंक ने उपाध्याय के चरणों में प्रणाम किया। उपाध्याय ने उनसे कहा- 'पुत्र उत्तंक! तुम्हारा स्वागत है। तुमने लौटने में इतना विलम्ब क्यों किया?'॥160॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  1.3.160 
अथोत्तङ्क उपाध्यायमभ्यवादयत्। तमुपाध्याय: प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क स्वागतं ते किं चिरं कृतमिति॥ १६०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उत्तंक ने उपाध्याय के चरणों में प्रणाम किया। उपाध्याय ने उनसे कहा- 'पुत्र उत्तंक! तुम्हारा स्वागत है। तुमने लौटने में इतना विलम्ब क्यों किया?'॥160॥
 
Thereafter Uttanka bowed down at the feet of Upadhyaya. Upadhyaya said to him- 'Son Uttanka! You are welcome. Why did you take so long to return?'॥ 160॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)