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mahabharat 1.3.153: उस समय सम्पूर्ण नागलोक धुएँ से भर गया। तब तक्षक भयभीत हो गया और अग्नि की लपटों के भय से व्याकुल होकर वह दोनों कुण्डलों को लेकर सहसा घर से बाहर निकल आया और उत्तंक से बोला - ॥153॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  1.3.153 
ताभिर्नागलोक उपधूपितेऽथ सम्भ्रान्तस्तक्षकोऽग्नेस्तेजोभयाद् विषण्ण: कुण्डले गृहीत्वा सहसा भवनान्निष्क्रम्योत्तङ्कमुवाच॥ १५३॥
 
 
अनुवाद
उस समय सम्पूर्ण नागलोक धुएँ से भर गया। तब तक्षक भयभीत हो गया और अग्नि की लपटों के भय से व्याकुल होकर वह दोनों कुण्डलों को लेकर सहसा घर से बाहर निकल आया और उत्तंक से बोला - ॥153॥
 
At that time the entire Nagaloka was filled with smoke. Then Takshak became frightened and being distressed by the fear of the flames of the fire, he suddenly came out of the house with both the earrings and said to Uttanka -॥ 153॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)