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mahabharat 1.3.130: वह उस छिद्रमें प्रवेश करके नागलोकमें अपने धामको चला गया। तत्पश्चात् उस क्षत्राणीके वचनोंका स्मरण करके उत्तंकने नागलोकतक तक्षकका पीछा किया ॥130॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  1.3.130 
प्रविश्य च नागलोकं स्वभवनमगच्छत्। अथोत्तङ्कस्तस्या: क्षत्रियाया वच: स्मृत्वा तं तक्षकमन्वगच्छत्॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
वह उस छिद्रमें प्रवेश करके नागलोकमें अपने धामको चला गया। तत्पश्चात् उस क्षत्राणीके वचनोंका स्मरण करके उत्तंकने नागलोकतक तक्षकका पीछा किया ॥130॥
 
After entering the hole, he went to his home in Nagaloka. Thereafter, remembering the words of that Kshatranee, Uttanka chased Takshak till Nagaloka.॥ 130॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)