Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.3.129: वास्तव में वह सर्पराज तक्षक था । भागते हुए वह उत्तंक के बहुत निकट आ गया । उत्तंक ने उसे पकड़ लिया । पकड़े जाते ही उसने क्षपणक का रूप त्यागकर तक्षक नाग का रूप धारण कर लिया और सहसा प्रकट होकर पृथ्वी के एक बहुत बड़े छिद्र में घुस गया ॥129॥ | mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तस्य तक्षको दृढमासन्न: स तं जग्राह गृहीतमात्र: स तद्रूपं विहाय तक्षकस्वरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाबिलं प्रविवेश॥ १२९॥
अनुवाद
वास्तव में वह सर्पराज तक्षक था । भागते हुए वह उत्तंक के बहुत निकट आ गया । उत्तंक ने उसे पकड़ लिया । पकड़े जाते ही उसने क्षपणक का रूप त्यागकर तक्षक नाग का रूप धारण कर लिया और सहसा प्रकट होकर पृथ्वी के एक बहुत बड़े छिद्र में घुस गया ॥129॥
In reality, it was the king of snakes, Takshak. While running, he came very close to Uttanka. Uttanka caught him. As soon as he was caught, he gave up the form of Kshapanak and assumed the form of Takshak Naag and suddenly appeared and entered a very big hole in the earth.॥ 129॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥