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mahabharat 1.3.115: तब उत्तंक ने राजा से कहा - 'मैंने उसे समय दे दिया है, परन्तु मैं शीघ्रता करना चाहता हूँ। कृपया जो भी शुद्ध और सुसंस्कृत भोजन आपने तैयार किया है, उसे ले आइए।' राजा ने 'बहुत अच्छा' कहकर जो भी भोजन उपलब्ध था, उसे उसे खिला दिया॥115॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  1.3.115 
तमुत्तङ्क: प्रत्युवाच कृतक्षण एवास्मि शीघ्रमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपस्कृतं भवतेति स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनैनं भोजयामास॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
तब उत्तंक ने राजा से कहा - 'मैंने उसे समय दे दिया है, परन्तु मैं शीघ्रता करना चाहता हूँ। कृपया जो भी शुद्ध और सुसंस्कृत भोजन आपने तैयार किया है, उसे ले आइए।' राजा ने 'बहुत अच्छा' कहकर जो भी भोजन उपलब्ध था, उसे उसे खिला दिया॥115॥
 
Then Uttanka said to the king, 'I have given him the time, but I want to hurry. Please bring whatever pure and cultured food you have prepared.' The king said, 'Very good' and fed him with whatever food was available.॥ 115॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)