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mahabharat 1.3.10: जब देवताओं की कुतिया सरमा ने इस प्रकार शाप दिया, तब जनमेजय अत्यन्त भयभीत और दुःखी हो गए ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.3.10 
जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जब देवताओं की कुतिया सरमा ने इस प्रकार शाप दिया, तब जनमेजय अत्यन्त भयभीत और दुःखी हो गए ॥10॥
 
When Sarama, the bitch of the gods, cursed him in this manner, Janamejaya became very frightened and sad. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)