श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 26: इन्द्रद्वारा की हुई वर्षासे सर्पोंकी प्रसन्नता  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  1.26.3-4 
परस्परमिवात्यर्थं गर्जन्त: सततं दिवि।
संवर्तितमिवाकाशं जलदै: सुमहाद्‍भुतै:॥ ३॥
सृजद्भिरतुलं तोयमजस्रं सुमहारवै:।
सम्प्रनृत्तमिवाकाशं धारोर्मिभिरनेकश:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वे बड़े जोर से गर्जना करते हुए आकाश से निरन्तर जल बरसाते रहते थे। उन अद्भुत मेघों ने बड़े जोर से गर्जना करते हुए और निरन्तर अनन्त जल बरसाते हुए सम्पूर्ण आकाश को ढँक लिया था। आकाश में वह समुद्र अपनी असंख्य तरंगों सहित मानो नृत्य कर रहा था॥3-4॥
 
They roared loudly and kept pouring water from the sky continuously. The amazing clouds roaring loudly and raining endless water continuously had engulfed the entire sky. That ocean in the sky with its innumerable waves was as if dancing.॥ 3-4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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