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mahabharat 1.25.17: 'इस लोक में मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए विप्रगण आपकी आराधना करते हैं। हे अतुलित बल के भण्डार इन्द्र! आपकी महिमा वेदों में भी गाई गई है। यज्ञ में तत्पर श्रेष्ठ द्विज आपको प्राप्त करने तथा वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं (यहाँ कद्रू ने इन्द्र की ईश्वर रूप में स्तुति की है)'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.25.17 
त्वं विप्रै: सततमिहेज्यसे फलार्थं
वेदाङ्गेष्वतुलबलौघ गीयसे च।
त्वद्धेतोर्यजनपरायणा द्विजेन्द्रा
वेदाङ्गान्यभिगमयन्ति सर्वय त् नै:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'इस लोक में मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए विप्रगण आपकी आराधना करते हैं। हे अतुलित बल के भण्डार इन्द्र! आपकी महिमा वेदों में भी गाई गई है। यज्ञ में तत्पर श्रेष्ठ द्विज आपको प्राप्त करने तथा वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं (यहाँ कद्रू ने इन्द्र की ईश्वर रूप में स्तुति की है)'॥17॥
 
‘Vipragana worship you to get the desired result in this world. Indra, the storehouse of incomparable strength! Your glory has also been sung in the Vedas. The best Dwijas who are devoted to Yagya, make every effort to attain you and acquire the knowledge of the Vedas (Indra has been praised in the form of God by Kadru here)'. 17॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे पञ्चविंशोऽध्याय:॥ २५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)