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mahabharat 1.25.16: 'आप परम यशस्वी हैं। ऐसा समझकर बुद्धिमान लोग सदैव आपकी पूजा करते हैं। महर्षि निरंतर आपकी स्तुति करते हैं। आप यजमानों की इच्छा पूरी करने के लिए यज्ञ में प्रसन्न मन से सोमरस का पान करते हैं तथा आपको समर्पित हविष्य भी बड़ी भक्ति से ग्रहण करते हैं।' 16॥   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.25.16 
महायशास्त्वमिति सदाभिपूज्यसे
मनीषिभिर्मुदितमना महर्षिभि:।
अभिष्टुत: पिबसि च सोममध्वरे
वषट्कृतान्यपि च हवींषि भूतये॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'आप परम यशस्वी हैं। ऐसा समझकर बुद्धिमान लोग सदैव आपकी पूजा करते हैं। महर्षि निरंतर आपकी स्तुति करते हैं। आप यजमानों की इच्छा पूरी करने के लिए यज्ञ में प्रसन्न मन से सोमरस का पान करते हैं तथा आपको समर्पित हविष्य भी बड़ी भक्ति से ग्रहण करते हैं।' 16॥
 
‘You are very successful. Understanding this, wise people always worship you. Maharishis continuously praise you. In order to fulfill the wishes of the host, you drink Somras with a happy mind in the Yagya and also accept the havishyas dedicated to you with great devotion. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)