अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति
श्लोक 1: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकादि महर्षि! तत्पश्चात् महाबली और पराक्रमी गरुड़ अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए समुद्र के उस पार अपनी माता के पास आये॥1॥
श्लोक 2: जहाँ उसकी माँ विनता अत्यंत दुःखी और व्यथित थी क्योंकि वह खेल हार गई थी और उसके साथ दासी जैसा व्यवहार किया जा रहा था। 2.
श्लोक 3: एक दिन कद्रू ने अपने पुत्र के पास बैठी हुई विनीत विनता को बुलाकर उससे यह कहा -॥3॥
श्लोक 4: 'कल्याणी विनती करती है! समुद्र के भीतर निर्जन प्रदेश में सर्पों का एक अत्यंत सुंदर एवं परम मनोहर निवास है। मुझे वहाँ ले चलो।'
श्लोक 5: तब गरुड़ की माता विनता सर्पों की माता कद्रू को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाने लगीं। उधर माता की आज्ञा से गरुड़ ने भी सर्पों को अपनी पीठ पर उठा लिया।
श्लोक 6: पक्षीराज गरुड़ सूर्य के निकट आकाश में विचरण करने लगे, जिससे सर्प सूर्य की किरणों से पीड़ित होकर अचेत हो गए।
श्लोक 7: अपने पुत्रों को इस अवस्था में देखकर कद्रू इन्द्र की स्तुति करने लगी - 'देवों के स्वामी! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। बलसूदन! मैं आपको प्रणाम करती हूँ।'
श्लोक 8: 'हजार नेत्रों वाले नमुचिनाशन! शचीपते! आपको नमस्कार है। आप सूर्य के ताप से पीड़ित सर्पों को जल से स्नान कराकर नौका के समान उनके रक्षक बनिए। 8॥
श्लोक 9: अमरोत्तम! आप हमारे सबसे बड़े रक्षक हैं। पुरंदर! आपमें सर्वाधिक जल बरसाने की शक्ति है॥9॥
श्लोक 10: 'आप ही मेघ हैं, आप ही वायु हैं और आप ही आकाश में बिजली के समान प्रकाशमान हैं। आप ही बादलों को छिन्न-भिन्न करने वाले हैं और विद्वान पुरुष आपको महामेघ कहते हैं। 10॥
श्लोक 11: आप वह भयंकर वज्र हैं, जिसकी संसार में कहीं तुलना नहीं है; आप भयंकर गर्जना करने वाले बलाहक (प्रलयकाल के मेघ) हैं। आप सम्पूर्ण लोकों के रचयिता और संहारक हैं। आप कभी पराजित नहीं होते॥ 11॥
श्लोक 12: आप ही समस्त प्राणियों के प्रकाश हैं। आप ही सूर्य और अग्नि भी हैं। आप ही अद्भुत, महान भूत हैं, आप ही राजा हैं और देवताओं में श्रेष्ठ हैं। 12॥
श्लोक 13: 'आप सर्वव्यापी विष्णु, सहस्रदर्शी इन्द्र, तेजोमय देवता और सबके परम आश्रय हैं। हे भगवन्! आप ही सर्वस्व हैं। आप ही अमृत हैं और आप ही परम पूज्य सोम हैं।' 13॥
श्लोक 14: 'मुहूर्त भी आप ही हैं, तिथि भी आप ही हैं, तरंग भी आप ही हैं और क्षण भी आप ही हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी आपसे भिन्न नहीं हैं। काल, कष्ट और त्रुटी, ये सब आपके ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु, मास, रात्रि और दिन भी आप ही हैं।॥14॥
श्लोक 15: 'आप पर्वतों और वनों से युक्त परम सुन्दरी हैं, आप अंधकार से रहित आकाश और सूर्य हैं। आप मेघों और बादलों से युक्त, अनेक मगरमच्छों और मछलियों से युक्त और उत्ताल तरंगों से सुशोभित समुद्र भी हैं। 15॥
श्लोक 16: 'आप परम यशस्वी हैं। ऐसा समझकर बुद्धिमान लोग सदैव आपकी पूजा करते हैं। महर्षि निरंतर आपकी स्तुति करते हैं। आप यजमानों की इच्छा पूरी करने के लिए यज्ञ में प्रसन्न मन से सोमरस का पान करते हैं तथा आपको समर्पित हविष्य भी बड़ी भक्ति से ग्रहण करते हैं।' 16॥
श्लोक 17: 'इस लोक में मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए विप्रगण आपकी आराधना करते हैं। हे अतुलित बल के भण्डार इन्द्र! आपकी महिमा वेदों में भी गाई गई है। यज्ञ में तत्पर श्रेष्ठ द्विज आपको प्राप्त करने तथा वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं (यहाँ कद्रू ने इन्द्र की ईश्वर रूप में स्तुति की है)'॥17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥