श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 24: गरुडके द्वारा अपने तेज और शरीरका संकोच तथा सूर्यके क्रोधजनित तीव्र तेजकी शान्तिके लिये अरुणका उनके रथपर स्थित होना  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  1.24.6-7 
प्रमतिरुवाच
चन्द्रार्काभ्यां यदा राहुराख्यातो ह्यमृतं पिबन्॥ ६॥
वैरानुबन्धं कृतवांश्चन्द्रादित्यौ तदानघ।
वध्यमाने ग्रहेणाथ आदित्ये मन्युराविशत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
प्रमति ने कहा - अनघ! जब राहु अमृत पी रहा था, तब चंद्रमा और सूर्य ने उसका रहस्य बता दिया; इसीलिए उसने चंद्रमा और सूर्य से घोर शत्रुता रख ली और उन्हें कष्ट देना शुरू कर दिया। राहु द्वारा कष्ट दिए जाने पर सूर्य का मन क्रोध से भर गया। 6-7।
 
Pramati said - Anagh! When Rahu was drinking nectar, the Moon and the Sun revealed his secret; that is why he developed a great enmity towards the Moon and the Sun and started tormenting them. On being troubled by Rahu, the Sun's mind was filled with anger. 6-7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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