श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 233: इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  1.233.11-12 
अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन।
तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम्॥ ११॥
आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वश:।
मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनंजय॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'कुरुनन्दन! मैं जानता हूँ कि वह समय कब आएगा। तुम्हारी महान तपस्या से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें समस्त अग्नि और सभी प्रकार के वायव्य अस्त्र प्रदान करूँगा। धनंजय! उस समय तुम्हें मेरे समस्त अस्त्र प्राप्त होंगे।'॥11-12॥
 
'Kurunandan! I know when that time will come. Pleased with your great penance, I will give you all the Agni and all types of Vaevy weapons. Dhananjay! At that time you will receive all my weapons.'॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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