श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 229: जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.229.12 
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणां शार्ङ्गास्ते प्रत्यूचुरथ मातरम्।
स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! शार्ङ्गपक्षी के बच्चों ने इस प्रकार विलाप करती हुई अपनी माता से कहा - 'माता! तुम अपना स्नेह छोड़कर ऐसे स्थान पर उड़ जाओ जहाँ अग्नि न हो॥ 12॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! The children of the Sharnga bird said to their mother who was weeping in this manner, 'Mother! Leave aside your affection and fly to a place where there is no fire.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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