श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  1.227.21-22h 
तस्मादित: सुरै: सार्धं गन्तुमर्हसि वासव॥ २१॥
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम्।
 
 
अनुवाद
‘अतः इन्द्र! तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि तुम देवताओं सहित यहाँ से चले जाओ। खाण्डव वन के इस विनाश को तुम भाग्य का कार्य समझो।’॥21 1/2॥
 
‘Therefore Indra! It is best for you to leave from here with the gods. Consider this destruction of Khandava forest to be the work of destiny.’॥ 21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)