श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.225.18 
महता रथवृन्देन नानारूपेण वासव:।
आकाशं समवाकीर्य प्रववर्ष सुरेश्वर:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वह नाना प्रकार के विशाल रथ लेकर आकाश में बैठे हुए देवताओं के स्वामी इन्द्र जल बरसाने लगे ॥18॥
 
He took with him several huge chariots of various kinds and sitting in the sky, Indra, the Lord of the gods, began raining water. ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)