श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.225.13 
शरैरभ्याहतानां च संघश: स्म वनौकसाम्।
विराव: शुश्रुवे घोर: समुद्रस्येव मथ्यत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
बाणों से घायल हुए वन के पशुओं के समूह की भयानक चीखें समुद्र मंथन के समय जलचरों की करुण चीखों के समान प्रतीत हो रही थीं॥13॥
 
The terrifying shrieks of the hordes of forest animals wounded by arrows seemed similar to the pitiful cries of aquatic animals during the churning of the ocean.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)