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mahabharat 1.224.17-19h: वह उत्तम रथ नाना प्रकार की ध्वजाओं से सुशोभित था। अर्जुन ने कमर बाँधी, कवच और तलवार धारण की, दस्ताने पहने और रथ की परिक्रमा करके देवताओं को प्रणाम करके उस पर इस प्रकार आरूढ़ हुए, जैसे कोई पुण्यात्मा विमान पर बैठता है।   |   mahabharat अध्याय 1.224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना  »  श्लोक 17-19h
 
 
श्लोक  1.224.17-19h 
स तं नानापताकाभि: शोभितं रथसत्तमम्॥ १७॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्य: प्रणम्य च।
संनद्ध: कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रक:॥ १८॥
आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा।
 
 
अनुवाद
वह उत्तम रथ नाना प्रकार की ध्वजाओं से सुशोभित था। अर्जुन ने कमर बाँधी, कवच और तलवार धारण की, दस्ताने पहने और रथ की परिक्रमा करके देवताओं को प्रणाम करके उस पर इस प्रकार आरूढ़ हुए, जैसे कोई पुण्यात्मा विमान पर बैठता है।
 
That excellent chariot was decorated with various flags. Arjuna girded his loins, put on his armour and sword, wore gloves and after circling the chariot and paying his respects to the gods, he mounted it, just as a pious soul sits on a plane.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)