श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 223: अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  1.223.5-6 
एवमस्त्विति तं वह्निर्ब्रह्माणं प्रत्यभाषत।
सम्भूतौ तौ विदित्वा तु नरनारायणावृषी॥ ५॥
कालस्य महतो राजंस्तस्य वाक्यं स्वयम्भुव:।
अनुस्मृत्य जगामाथ पुनरेव पितामहम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तब अग्निदेव ने ब्रह्माजी से कहा - 'ठीक है, यह बात ठीक है।' बहुत समय बीतने पर नर-नारायण ऋषियों के अवतार की बात जानकर अग्निदेव को ब्रह्माजी की बात याद आई। राजन! तब वे पुनः ब्रह्माजी के पास गए।
 
Then Agni said to Brahmaji - 'Okay, that's right.' After a long time, after knowing about the incarnation of Nar-Narayan sages, Agnidev remembered Brahmaji's words. Rajan! Then he again went to Brahmaji. 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)