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mahabharat 1.222.83: इस प्रकार खाण्डव वन में आग बार-बार भड़की और उसे सात बार जलाने का प्रयास किया गया; किन्तु हर बार वनवासियों ने उसे बुझा दिया।   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  1.222.83 
अनेन तु प्रकारेण भूयो भूयश्च प्रज्वलन्।
सप्तकृत्व: प्रशमित: खाण्डवे हव्यवाहन:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार खाण्डव वन में आग बार-बार भड़की और उसे सात बार जलाने का प्रयास किया गया; किन्तु हर बार वनवासियों ने उसे बुझा दिया।
 
In this manner the fire in the Khandava forest flared up again and again and tried to burn it down seven times; but each time the residents of the forest extinguished it.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)