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mahabharat 1.222.66: अब उसे किसी और का प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं रही। उसका रंग सफेद हो गया, उसकी चमक फीकी पड़ गई और वह पहले जैसा चमकता नहीं रहा।   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.222.66 
न चैच्छत् पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित्।
पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत् प्रकाशते॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
अब उसे किसी और का प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं रही। उसका रंग सफेद हो गया, उसकी चमक फीकी पड़ गई और वह पहले जैसा चमकता नहीं रहा।
 
Now he no longer had the desire to accept anyone else's offerings. His colour turned white, his lustre faded and he did not shine as before.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)