Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.222.65: उस अद्वितीय यज्ञ में घी की निरन्तर एवं अविच्छिन्न धाराओं से अग्निदेव को महान् तृप्ति प्राप्त हुई ॥65॥   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.222.65 
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि।
हविषा च ततो वह्नि: परां तृप्तिमगच्छत॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
उस अद्वितीय यज्ञ में घी की निरन्तर एवं अविच्छिन्न धाराओं से अग्निदेव को महान् तृप्ति प्राप्त हुई ॥65॥
 
In that unique Yagya, Agnidev got great satisfaction from the continuous and uninterrupted streams of ghee. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)