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mahabharat 1.222.52: अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं करूँगा। इस पृथ्वी पर एक अत्यन्त भाग्यशाली ब्राह्मण है, जो मेरा ही अंश है॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.222.52 
अतोऽहं त्वां स्वयं नाद्य याजयामि परंतप।
ममांशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तम:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं करूँगा। इस पृथ्वी पर एक अत्यन्त भाग्यशाली ब्राह्मण है, जो मेरा ही अंश है॥ 52॥
 
‘Therefore Parantapa! I myself will not perform your yagya. On this earth there is a very fortunate Brahmin who is my own part.॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)