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mahabharat 1.222.41: और स्नेहमय गम्भीर वाणी में भगवान् ने उससे कहा - 'परन्तप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हूँ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.222.41 
उवाच चैनं भगवान् स्निग्धगम्भीरया गिरा।
प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
और स्नेहमय गम्भीर वाणी में भगवान् ने उससे कहा - 'परन्तप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हूँ॥41॥
 
And in an affectionate, serious voice, God said to him – 'Parantap! Male best! I am very happy with your penance. 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)