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mahabharat 1.222.29: हे ब्राह्मणों! बिना किसी दोष के इस प्रकार मुझे त्यागना आपके लिए उचित नहीं है। मैं आपकी शरण में हूँ। आप मुझ पर कृपा करें और प्रसन्न हों॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.222.29 
अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमा:।
प्रपन्न एव वो विप्रा: प्रसादं कर्तुमर्हथ॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणों! बिना किसी दोष के इस प्रकार मुझे त्यागना आपके लिए उचित नहीं है। मैं आपकी शरण में हूँ। आप मुझ पर कृपा करें और प्रसन्न हों॥ 29॥
 
'O Brahmins! It is not right for you to abandon me in this manner without any fault. I am in your refuge. Please be kind and pleased with me.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)