श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  » 
 
 
अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा
 
श्लोक 1:  वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! वे ब्राह्मण देवता, अर्जुन और सात्वतवंशी भगवान वासुदेव, जो विश्वविख्यात वीर थे और खांडववन के निकट खड़े थे, बोले-॥ 1॥
 
श्लोक 2:  'मैं बहुत खाने वाला और सदैव अत्यन्त अन्न खाने वाला ब्राह्मण हूँ। वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन! आज मैं आप दोनों से भिक्षा माँगता हूँ। आप दोनों मुझे भरपेट भोजन कराकर तृप्त करें।'॥2॥
 
श्लोक 3:  उनके ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले - 'ब्रह्मन्! बताओ, किस भोजन से तुम तृप्त होगे? हम दोनों उसी का प्रयत्न करेंगे।'॥3॥
 
श्लोक 4:  जब वे दोनों वीर पुरुष बार-बार पूछते रहे कि, “तुम्हारे लिए क्या भोजन की व्यवस्था की जाए?”, तब उनके ऐसा कहने पर भगवान अग्निदेव ने उनसे इस प्रकार कहा॥4॥
 
श्लोक 5:  ब्राह्मण देवता बोले - वीरों! मुझे भोजन की भूख नहीं है, तुम सब मुझे अग्नि ही समझो। तुम दोनों मुझे जो भी भोजन अच्छा लगे, दे दो।
 
श्लोक 6:  इस खाण्डव वन की रक्षा इन्द्र सदैव करते हैं। उन महामानस द्वारा रक्षित होने के कारण मैं इसे जलाने में असमर्थ हूँ।॥6॥
 
श्लोक 7:  इन्द्र का मित्र तक्षक नाग अपने परिवार सहित इस वन में सदैव निवास करता है, इसलिए इन्द्र वज्र धारण करके इसकी सदैव रक्षा करते हैं॥7॥
 
श्लोक 8:  उस तक्षक नाग के कारण ही वे यहाँ रहने वाले अन्य अनेक प्राणियों की रक्षा करते हैं, अतः इन्द्र के प्रभाव से मैं इस वन को जलाने में समर्थ नहीं हूँ। परन्तु इसे जलाने की इच्छा मुझमें सदैव बनी रहती है॥8॥
 
श्लोक 9:  मुझे जलता हुआ देखकर वे बादलों के द्वारा जल बरसाने लगते हैं। यही कारण है कि इस खाण्डव वन को जलाने की इच्छा होने पर भी मैं ऐसा करने में सफल नहीं हो पाता हूँ॥9॥
 
श्लोक 10:  आप दोनों ही शस्त्रविद्या में पारंगत हैं, अतः मैं आपके पास केवल इसी उद्देश्य से आया हूँ कि आपकी सहायता से इस खाण्डव वन को जला डालूँ। मैं आपसे यह अन्न भिक्षा में माँगता हूँ॥10॥
 
श्लोक 11:  तुम दोनों ही उत्तम अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में निपुण हो। इसलिए जब मैं इस वन को जलाने लगूँगा, तब तुम सब लोग ऊपर से गिरने वाली जलधाराओं को तथा इस वन से निकलकर सब दिशाओं में भागने वाले पशुओं को रोक दोगे॥11॥
 
श्लोक 12:  जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! भगवान अग्निदेव देवराज इन्द्र द्वारा रक्षित तथा नाना प्रकार के पशुओं से युक्त खाण्डव वन को क्यों जलाना चाहते थे? 12॥
 
श्लोक 13:  हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं ऐसा कोई साधारण कारण नहीं जानता जिसके कारण कुपित हव्यवाहन अग्नि ने सम्पूर्ण खाण्डव वन को जला डाला॥13॥
 
श्लोक 14:  हे ब्राह्मण! हे मुनि! मैं पूर्वकाल में खाण्डव वन के जलने का यथार्थ वृत्तांत विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।॥14॥
 
श्लोक 15:  वैशम्पायन बोले, 'महाराज जनमेजय! मैं आपको अग्निदेव द्वारा खाण्डव वन को जलाए जाने का सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाता हूँ। सुनिए।'
 
श्लोक 16:  हे पुरुषश्रेष्ठ! खाण्डववन के विनाश से संबंधित यह प्राचीन कथा महर्षियों ने प्रस्तुत की है। वही मैं तुमसे कहता हूँ॥16॥
 
श्लोक 17:  हे राजन! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन काल में श्वेतकि नाम का एक राजा था जो इन्द्र के समान पराक्रमी और बलवान था।
 
श्लोक 18:  उस समय उनके समान बुद्धिमान, दानी और महान कोई नहीं था। उन्होंने बहुत-से बड़े-बड़े यज्ञ किए थे, जिनमें उन्हें बहुत-सी दक्षिणा मिली थी॥18॥
 
श्लोक 19:  राजा! प्रतिदिन उसके मन में यज्ञ और दान के अतिरिक्त और कोई विचार नहीं उठता था। वह यज्ञ और नाना प्रकार के दान के अनुष्ठान में ही लगा रहता था।
 
श्लोक 20:  इस प्रकार वह बुद्धिमान राजा ऋत्विजों के साथ यज्ञ करता था। यज्ञ करते समय उसके पुत्रों की आँखें धुएँ से व्याकुल हो गईं ॥20॥
 
श्लोक 21-23h:  वे सभी बहुत दिनों से यज्ञ करते-करते थक गए थे। इसलिए वे राजा के पास से चले गए। तब राजा ने उन पुरोहितों को पुनः यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया। परन्तु जिन पुरोहितों की आँखें दुखने लगी थीं, वे उनके यज्ञ में नहीं आए। तब राजा ने उनकी अनुमति लेकर अन्य ब्राह्मणों को पुरोहित बनाया और उनके साथ आरंभ किया हुआ यज्ञ पूर्ण किया।
 
श्लोक 23-24:  इस प्रकार किसी समय यज्ञ में तत्पर राजा के मन में एक ऐसा सत्र आरम्भ करने का विचार आया जो सौ वर्षों तक चलता रहे; किन्तु उस महामनस्वी को यज्ञ आरम्भ करने के लिए कोई पुरोहित नहीं मिला।
 
श्लोक 25-26:  उस परम यशस्वी राजा ने अपने बन्धुओं के साथ मिलकर इस कार्य के लिए बड़ा प्रयत्न किया। उसने पुरोहितों के चरणों में गिरकर, सान्त्वनापूर्वक वचन कहकर, इच्छानुसार दान देकर, तथा निष्काम भाव से उनसे यज्ञ करने की प्रार्थना करके बार-बार उन्हें समझाया; परन्तु उन्होंने उस परम प्रतापी राजा की इच्छा पूरी नहीं की॥ 25-26॥
 
श्लोक 27-28:  तब राजा ने कुछ क्रोधित होकर आश्रम में रहने वाले ऋषियों से कहा - "हे ब्राह्मणो! यदि मैं पतित होकर आपकी सेवा से विमुख हो जाऊँ, तो निन्दित होकर आप सभी ब्राह्मणों द्वारा शीघ्र ही त्याग दिए जाने योग्य हूँ, अन्यथा नहीं; अतः आप लोग यज्ञ करने के लिए मेरी बढ़ी हुई भक्ति में कोई बाधा न डालें॥ 27-28॥
 
श्लोक 29:  हे ब्राह्मणों! बिना किसी दोष के इस प्रकार मुझे त्यागना आपके लिए उचित नहीं है। मैं आपकी शरण में हूँ। आप मुझ पर कृपा करें और प्रसन्न हों॥ 29॥
 
श्लोक 30:  हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं कर्म का आकांक्षी होकर सत्य वचनों से आपको प्रसन्न करके, सान्त्वना देकर तथा दान आदि की बात कहकर अपना कर्म आपको अर्पित कर रहा हूँ॥30॥
 
श्लोक 31:  ‘द्विजौत्तमो! यदि आप द्वेषवश मुझे त्याग देंगे, तो मैं अन्य ऋत्विजों के पास जाकर यह यज्ञ करूँगा ॥31॥
 
श्लोक 32-33:  ऐसा कहकर राजा चुप हो गए। परंतप जनमेजय! जब वे राजा ऋत्विज का यज्ञ करने के लिए तैयार नहीं हो सके, तब उन्होंने क्रोधित होकर उस महामना से कहा - 'भूपाल शिरोमणे! आपके यज्ञ निरन्तर चलते रहें ॥ 32-33॥
 
श्लोक 34-35:  अतः निरन्तर परिश्रम करने से हम थक गए हैं, पहले के परिश्रम से हमारा दुःख बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में यदि आप चाहें तो बुद्धि के मोहग्रस्त होने के कारण शीघ्रता से हमारा परित्याग कर सकते हैं। हे पापरहित राजा! आप भगवान रुद्र के पास ही जाएँ। अब वे ही आपका यज्ञ सम्पन्न करेंगे।॥ 34-35॥
 
श्लोक 36:  ब्राह्मणों की यह निन्दा सुनकर राजा श्वेतकि अत्यन्त क्रोधित हो गए और कैलाश पर्वत पर जाकर घोर तपस्या करने लगे।
 
श्लोक 37:  हे राजन! कठोर व्रत रखने वाले राजा श्वेतकि ने बहुत दिनों तक निराहार रहकर मन और इन्द्रियों को संयमित करके भगवान महादेव की आराधना की।
 
श्लोक 38:  कभी बारहवें दिन तो कभी सोलहवें दिन वह कंद-मूल और फल खाता था। 38.
 
श्लोक 39:  राजा श्वेताकी दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर सूर्य की ओर देखते हुए, एकाग्रचित्त और स्थिर मन से छः महीने तक खड़े रहे।
 
श्लोक 40:  उस महापुरुष को इस प्रकार घोर तप करते देख भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए ॥40॥
 
श्लोक 41:  और स्नेहमय गम्भीर वाणी में भगवान् ने उससे कहा - 'परन्तप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हूँ॥41॥
 
श्लोक 42-43h:  ‘राजन्! आपका कल्याण हो। आप अपनी इच्छानुसार वर मांगिए।’ अत्यंत तेजस्वी रुद्र के ये वचन सुनकर राजा श्वेतकि ने भगवान शिव के चरणों में प्रणाम किया और इस प्रकार कहा -॥42 1/2॥
 
श्लोक 43-45h:  ‘देवदेवेश! सुरेश्वर! यदि आप परम पूज्य देव मुझ पर प्रसन्न हैं, तो स्वयं पधारें और मेरा यज्ञ करें।’ राजा की बात सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए और मुस्कुराते हुए बोले- 43-44 1/2॥
 
श्लोक 45-46:  'हे राजन! यज्ञ करना हमारा काम नहीं है; परंतु आपने यह वरदान मांगने के लिए घोर तप किया है, इसलिए हे परंतपराज! मैं एक शर्त पर आपका यज्ञ संपन्न करूंगी।'
 
श्लोक 47-48h:  रुद्र बोले - राजेन्द्र! यदि तुम एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करोगे और बारह वर्षों तक अखंड घी की धारा से अग्निदेव को तृप्त करोगे, तो तुम्हें वह सब प्राप्त होगा जिसकी तुम कामना कर रहे हो।
 
श्लोक 48-49:  भगवान रुद्र की यह बात सुनकर राजा श्वेतकि ने शूलपाणि शिव की आज्ञा से सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न किया। बारहवें वर्ष पूर्ण होने पर भगवान महेश्वर पुनः लौट आए। 48-49।
 
श्लोक 50:  सम्पूर्ण लोकों के रचयिता भगवान शंकर ने जैसे ही उस श्रेष्ठ श्वेत पुरुष को देखा, वे अत्यन्त प्रसन्न हो गए और बोले- 50॥
 
श्लोक 51:  'भूपालशिरोमणे! आपने वेदविहित इस कर्म से मुझे पूर्णतया संतुष्ट किया है, किन्तु परंतप! शास्त्रविधि के अनुसार यज्ञ करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही है।' 51.
 
श्लोक 52:  अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं करूँगा। इस पृथ्वी पर एक अत्यन्त भाग्यशाली ब्राह्मण है, जो मेरा ही अंश है॥ 52॥
 
श्लोक 53:  'वह दुर्वासा नाम से प्रसिद्ध हैं। मेरी अनुमति से महाबली दुर्वासा तुम्हारा यज्ञ सम्पन्न करेंगे; तुम सामग्री एकत्रित करो।'
 
श्लोक 54:  भगवान रुद्र के ये वचन सुनकर राजा अपने नगर में लौट आया और यज्ञ की सामग्री एकत्रित करने लगा।
 
श्लोक 55-58:  तत्पश्चात् सामग्री एकत्रित करके वह पुनः भगवान रुद्र के पास गया और बोला - 'महादेव! आपकी कृपा से मेरी यज्ञ सामग्री तथा अन्य सभी आवश्यक उपकरण एकत्रित हो गए। अब कल मुझे यज्ञ की दीक्षा मिलनी चाहिए।' महाभागराज का यह कथन सुनकर भगवान रुद्र ने दुर्वासा को बुलाकर कहा - 'द्विजश्रेष्ठ! ये महाभाग राजा श्वेतकि हैं। विप्रेन्द्र! मेरी अनुमति से तुम इन भूमिपालकों का यज्ञ करो।' यह सुनकर महर्षि ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की। 55-58॥
 
श्लोक 59:  तत्पश्चात्, उस महामनस्वी राजा का यज्ञ नियत समयानुसार प्रारम्भ हुआ। सब कुछ शास्त्रविधि के अनुसार किया गया। उस यज्ञ में बहुत-सी दक्षिणा दी गई। 59.
 
श्लोक 60-62:  उस महान राजा के उस यज्ञ के पूर्ण होने पर उसमें दीक्षित हुए सभी महाजन और ऋत्विज दुर्वासाजी की अनुमति लेकर अपने-अपने स्थान को चले गए। राजन! वे महान भाग्यवान राजा भी वेदों में पारंगत महाभाग ब्राह्मणों द्वारा सम्मानित होकर अपनी राजधानी को गए। उस समय ग्रामवासियों ने उनकी स्तुति गाई और ग्रामवासियों ने उनका सत्कार किया। 60-62॥
 
श्लोक 63-64:  महामुनि श्वेतिक का आचरण और व्यवहार ऐसा ही था। दीर्घकाल के पश्चात् वे अपने यज्ञ के समस्त सदस्यों तथा ऋत्विजों सहित देवताओं द्वारा स्तुति पाकर स्वर्गलोक को गए। उनके यज्ञ में अग्निदेव ने लगातार बारह वर्षों तक घी पिया था। 63-64॥
 
श्लोक 65:  उस अद्वितीय यज्ञ में घी की निरन्तर एवं अविच्छिन्न धाराओं से अग्निदेव को महान् तृप्ति प्राप्त हुई ॥65॥
 
श्लोक 66:  अब उसे किसी और का प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं रही। उसका रंग सफेद हो गया, उसकी चमक फीकी पड़ गई और वह पहले जैसा चमकता नहीं रहा।
 
श्लोक 67:  तब भगवान अग्निदेव के पेट में विकार उत्पन्न हो गया, वे तेजहीन हो गए और अपमान से पीड़ित होने लगे।
 
श्लोक 68:  अपने को तेज से हीन देखकर अग्निदेव लोगों द्वारा पूजित ब्रह्माजी के पवित्र धाम में गए ॥68॥
 
श्लोक 69:  वहाँ बैठकर उन्होंने ब्रह्माजी से इस प्रकार कहा - 'हे प्रभु! राजा श्वेतकि ने अपने यज्ञ से मुझे अत्यंत संतुष्ट किया है।'
 
श्लोक 70-71h:  परन्तु मुझे भोजन से बड़ी घृणा हो गई है, जिसे मैं किसी भी प्रकार से दूर नहीं कर सकता। हे जगत्पति! इस घृणा के कारण मैं अपनी शक्ति और बल खो रहा हूँ। अतः आपकी कृपा से मैं स्वस्थ हो जाऊँ, मेरी स्वाभाविक स्थिति सुदृढ़ बनी रहे, यही मेरी कामना है।॥70 1/2॥
 
श्लोक 71-74:  अग्निदेव के ये वचन सुनकर सम्पूर्ण जगत् के रचयिता भगवान ब्रह्मा हँसकर वायुयान अग्नि से इस प्रकार बोले - 'महाभाग! तुमने बारह वर्षों तक वसुधारा को अर्पित किए गए घृतधारा का सेवन किया है। इसी कारण तुम्हें ग्लानि हुई है। हव्यवाहन! तेजहीन होने के कारण तुम्हें सहसा ग्लानि को अपने मन में नहीं लाना चाहिए। वहने! तुम पुनः स्वस्थ हो जाओगे। समय मिलने पर मैं तुम्हारे वैराग्य का नाश कर दूँगा। 71-74॥
 
श्लोक 75-76:  'पूर्वकाल में देवताओं की आज्ञा से तुमने राक्षसों के अत्यन्त भयानक निवास खाण्डववन को जला डाला था, इस समय वहाँ सब प्रकार के प्राणी आकर निवास करते हैं। विभावसो! तुम उनकी चर्बी से तृप्त होकर स्वस्थ हो सकोगे। 75-76॥
 
श्लोक 77-78:  'तुम शीघ्र ही उस वन को जला डालने जाओ। तभी तुम इस लज्जा से मुक्त हो सकोगे।' परमब्रह्म के मुख से ये वचन सुनकर अग्निदेव बड़े वेग से वहाँ पहुँचे। खाण्डव वन में पहुँचकर, अपने महाबल का आश्रय लेकर तथा वायु का सहारा पाकर, कुपित अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे। 77-78।
 
श्लोक 79:  खाण्डव वन को जलता देख वहाँ रहने वाले लोगों ने आग बुझाने का बहुत प्रयास किया।
 
श्लोक 80:  सैकड़ों-हजारों हाथी अपनी सूंड में पानी लेकर दौड़ते हुए आते और गुस्से में उसे आग पर डाल देते।
 
श्लोक 81:  अनेक सिर वाले सर्प भी क्रोध से अचेत हो गए और अग्नि के पास अपने सिरों से जल की धाराएँ तेजी से बरसाने लगे।
 
श्लोक 82:  हे भरतश्रेष्ठ! इसी प्रकार अन्य प्राणियों ने भी नाना प्रकार के प्रहारों (धूल आदि फेंककर) तथा प्रयत्नों (जल आदि छिड़ककर) द्वारा उस अग्नि को शीघ्र ही बुझा दिया।
 
श्लोक 83:  इस प्रकार खाण्डव वन में आग बार-बार भड़की और उसे सात बार जलाने का प्रयास किया गया; किन्तु हर बार वनवासियों ने उसे बुझा दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)