श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.220.76 
सिंहदर्पं महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम्।
मेघदुन्दुभिनिर्घोषं पूर्णचन्द्रनिभाननम्॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
उनमें सिंह का सा अभिमान और मतवाले हाथी का सा पराक्रम था। अपनी गम्भीर वाणी से वह महान धनुर्धर बादलों और ढोल की ध्वनि को भी लज्जित कर देता था। पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान उसका मुख हृदय में आनन्द उत्पन्न करता था।
 
He had the pride of a lion and the valour of a drunken elephant. With his deep voice, that great archer would put the clouds and the sound of a drum to shame. His face, like the full moon, would create joy in the heart.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)