श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.220.4 
प्रदानमपि कन्याया: पशुवत् कोऽनुमन्यते।
विक्रयं चाप्यपत्यस्य क: कुर्यात् पुरुषो भुवि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'ऐसा कौन वीर होगा जो अपनी पुत्री के विवाह की प्रतीक्षा में पशु की भाँति निर्बल होकर बैठा रहेगा और इस पृथ्वी पर ऐसा कौन नीच मनुष्य होगा जो धन के लिए अपनी सन्तान को बेच देगा?॥4॥
 
'Who would be such a brave man who would sit like an animal, devoid of courage, waiting for the handing over of his daughter in marriage and who would be such a mean man on this earth who would sell his own child for money?॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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