श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.220.3 
अर्थलुब्धान् न व: पार्थो मन्यते सात्वतान् सदा।
स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डव:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र अर्जुन जानते हैं कि सात्वत कुल के लोग सदैव धन के लोभी नहीं होते, अतः धन देकर कन्या प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके अतिरिक्त पाण्डुपुत्र अर्जुन यह भी जानते हैं कि स्वयंवर में कन्या मिलने की पूर्ण निश्चितता नहीं है, अतः वह भी अस्वीकार्य है॥3॥
 
‘Pandu's son Arjun knows that the people of Satvat clan are not always greedy for money, hence the bride cannot be obtained by giving money. Besides this, Pandu's son Arjun also knows that there is no complete certainty of getting the bride in Swayamvar, hence that too is unacceptable.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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