| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा » श्लोक 25-27 |
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| | | | श्लोक 1.220.25-27  | ततस्ते हृष्टमनस: पाण्डवेया महारथा:।
कुन्ती च परमप्रीता बभूव जनमेजय॥ २५॥
श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्ष: सम्प्राप्तं स्वं पुरोत्तमम्।
अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा॥ २६॥
आजगाम विशुद्धात्मा सह रामेण केशव:।
वृष्ण्यन्धकमहामात्रै: सह वीरैर्महारथै:॥ २७॥ | | | | | | अनुवाद | | जनमेजय! तत्पश्चात् महाबली पाण्डवों के हृदय में हर्ष छा गया और कुन्तीदेवी भी अत्यन्त प्रसन्न हुईं। जब कमलनेत्र भगवान श्रीकृष्ण ने सुना कि पाण्डवों में श्रेष्ठ अर्जुन अपने श्रेष्ठ नगर इन्द्रप्रस्थ में पहुँच गए हैं, तब वे शुद्धात्मा श्रीकृष्ण और बलरामजी तथा वृष्णि और अन्धक वंश के प्रमुख वीर योद्धाओं के साथ वहाँ आये। 25-27॥ | | | | Janamejaya! After that, the great Pandavas became filled with joy in their hearts and Kuntidevi also became very happy. When the lotus-eyed Lord Shri Krishna heard that the best of the Pandavas, Arjun, had reached his best city Indraprastha, he came there along with the pure soul Shri Krishna and Balram and the chief brave warriors of the Vrishni and Andhaka dynasty. 25-27॥ | | ✨ ai-generated | | |
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