श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.216.9-10 
यदा च वो ग्राहभूता गृह्णन्ती: पुरुषाञ्जले।
उत्कर्षति जलात् तस्मात् स्थलं पुरुषसत्तम:॥ ९॥
तदा यूयं पुन: सर्वा: स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जब कोई महापुरुष तुम सब अप्सराओं को, जो जल में मगरमच्छों के समान मनुष्यों को पकड़ती हो, जल से निकालकर स्थल पर ले आएगा, तब तुम सब अपना दिव्य रूप पुनः प्राप्त कर लोगी। मैंने कभी मजाक में भी झूठ नहीं बोला॥9-10॥
 
When some great man will pull out all you Apsaras, who catch people like crocodiles in water, out of water on land, then all of you will regain your divine form. I have never told a lie even in jest.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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