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श्लोक 1.216.27-28  |
इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्रागत्य रंस्यसि।
कुन्तीं युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ॥ २७॥
आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च बान्धवान्।
बान्धवै: सहिता: सर्वैर्नन्दसे त्वमनिन्दिते॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| 'तब तुम उचित समय पर हमारे धाम इन्द्रप्रस्थ में आकर अत्यन्त सुखपूर्वक रहोगे। वहाँ आकर तुम्हें माता कुन्ती, युधिष्ठिर, भीमसेन, मेरे छोटे भाई नकुल-सहदेव तथा अन्य सम्बन्धियों से मिलने का अवसर मिलेगा। अनिन्दिते! इन्द्रप्रस्थ में मेरे सभी मित्रों और सम्बन्धियों से मिलकर तुम्हें अत्यन्त प्रसन्नता होगी। 27-28॥ |
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| 'Then at the right time, you will come to our abode Indraprastha and live very happily. When you come there, you will get a chance to see Mother Kunti, Yudhishthir, Bhimsen, my younger brothers Nakul-Sahdev and other relatives. Anindite! You will be very happy to meet all my friends and relatives in Indraprastha. 27-28॥ |
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