श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  1.212.d1 
(आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन।
भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम्॥ )
 
 
अनुवाद
यशोवर्धन! कृपया मुझे वन जाने की अनुमति दीजिए। मैं आपकी आज्ञा के बिना कोई भी कार्य न करने का दृढ़ निश्चय कर चुका हूँ।
 
Yashovardhan! Please give me permission to go to the forest. I am determined not to do anything without your permission.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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