श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.212.35 
वैशम्पायन उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षित:।
वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं - जनमेजय! राजा की अनुमति लेकर अर्जुन ने वनवास की दीक्षा ली और वहाँ से बारह वर्ष तक वन में रहने के लिए चले गये।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! After taking the king's permission, Arjuna took the initiation of exile and left from there to live in the forest for twelve years.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं)
 
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