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वैशम्पायन जी कहते हैं - जनमेजय! राजा की अनुमति लेकर अर्जुन ने वनवास की दीक्षा ली और वहाँ से बारह वर्ष तक वन में रहने के लिए चले गये।
Vaishmpayana says - Janamejaya! After taking the king's permission, Arjuna took the initiation of exile and left from there to live in the forest for twelve years.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥