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mahabharat 1.212.25-26: तदनन्तर समस्त गौएँ ब्राह्मण को देकर और उसे प्रसन्न करके पाण्डुपुत्र वीर धनंजय अतुलित यश को प्राप्त होकर अपने नगर को लौट आया। वहाँ उसने अपने समस्त गुरुजनों को प्रणाम किया और सभी गुरुजनों ने उसकी स्तुति और अभिनन्दन किया॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 1.212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  1.212.25-26 
ब्राह्मणं समुपाकृत्य यश: प्राप्य च पाण्डव:।
ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये॥ २५॥
आजगाम पुरं वीर: सव्यसाची धनंजय:।
सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दित:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर समस्त गौएँ ब्राह्मण को देकर और उसे प्रसन्न करके पाण्डुपुत्र वीर धनंजय अतुलित यश को प्राप्त होकर अपने नगर को लौट आया। वहाँ उसने अपने समस्त गुरुजनों को प्रणाम किया और सभी गुरुजनों ने उसकी स्तुति और अभिनन्दन किया॥25-26॥
 
Then after giving all the cattle to the Brahmin and making him happy, the brave Dhananjay, son of Pandu, became the recipient of unmatched fame and returned to his city. There he bowed down to all his teachers and all the teachers praised and congratulated him.॥25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)