श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  1.212.21-22h 
एवं विनिश्चित्य तत: कुन्तीपुत्रो धनंजय:।
अनुप्रविश्य राजानमापृच्छॺ च विशाम्पते॥ २१॥
धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत।
 
 
अनुवाद
जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजय ने राजा से पूछकर घर में प्रवेश किया और धनुष लेकर (बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मण से कहा -॥21 1/2॥
 
Janamejaya! Having made this decision, Kuntikumar Dhananjaya, after asking the king, entered the house and took the bow and (coming out) happily said to the Brahmin -॥ 21 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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