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mahabharat 1.21.10: तट पर तीव्र वेग से बहती हुई वायु ने समुद्र को झूला बनाकर उसे चंचल बना दिया था। वह अपने क्रोध और आवेश से बहुत ऊँची लहरें उठा रही थी और सर्वत्र चंचल लहरों के रूप में अपने हाथ हिलाकर मानो नाच रही थी॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.21: समुद्रका विस्तारसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 21: समुद्रका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.21.10 
वेलादोलानिलचलं क्षोभोद्वेगसमुच्छ्रितम्।
वीचीहस्तै: प्रचलितैर्नृत्यन्तमिव सर्वत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तट पर तीव्र वेग से बहती हुई वायु ने समुद्र को झूला बनाकर उसे चंचल बना दिया था। वह अपने क्रोध और आवेश से बहुत ऊँची लहरें उठा रही थी और सर्वत्र चंचल लहरों के रूप में अपने हाथ हिलाकर मानो नाच रही थी॥10॥
 
The wind blowing at a high speed on the shore made the ocean playful by becoming a swing. It raised very high waves with its anger and excitement and was dancing as if by waving its hands in the form of playful waves everywhere.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)