श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव  » 
 
 
अध्याय 208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव
 
श्लोक 1:  नारद बोले, 'कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! यह घटना किस प्रकार घटी, उस प्राचीन कथा को मुझसे और अपने भाइयों से विस्तारपूर्वक सुनो।'
 
श्लोक 2:  प्राचीन काल में महाबली दैत्य हिरण्यकशिपु के कुल में निकुम्भ नाम का एक विख्यात दैत्यराज हुआ, जो बड़ा तेजस्वी और बलवान था। 2॥
 
श्लोक 3:  उसके दो पुत्र थे जो अत्यन्त बलवान और भयंकर थे, जिनके नाम सुन्द और उपसुन्द थे। वे दोनों राक्षस राजा बड़े ही भयंकर और क्रूर हृदय वाले थे॥3॥
 
श्लोक 4:  उनका एक ही संकल्प था और वे सदैव एक ही कार्य के लिए एक थे। उनके सुख-दुःख भी एक ही प्रकार के थे। वे दोनों सदैव एक साथ रहते थे॥4॥
 
श्लोक 5:  उनमें से एक दूसरे के बिना न खाता था, न पीता था, न किसी से बात करता था। वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे और एक-दूसरे से मीठी-मीठी बातें करते थे।
 
श्लोक 6:  उनका चरित्र और व्यवहार एक जैसा था, मानो एक ही आत्मा दो शरीरों में बँट गई हो। वे महाबली राक्षस एक साथ विचरण करने लगे। हर कार्य में वे एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते थे।
 
श्लोक 7:  किसी समय तीनों लोकों पर विजय पाने की इच्छा से वे गुरु से दीक्षा लेने को तैयार हो गए और विन्ध्य पर्वत पर आकर वहाँ कठोर तप करने लगे॥7॥
 
श्लोक 8:  भूख-प्यास की पीड़ा सहते हुए, सिर पर जटाएं और शरीर पर छाल लिए दोनों भाई बहुत समय तक घोर तपस्या में लगे रहे।
 
श्लोक 9:  उनके शरीर पर मैल जम गया था। वे वायु पर रहते थे और अपने ही मांस के टुकड़े-टुकड़े करके अग्नि में होम करते थे। तत्पश्चात्, वे बहुत देर तक अपने पैरों के अग्रभागों पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाए, व्रत और तपस्या करते हुए, एकटक भगवान् को देखते रहे॥9॥
 
श्लोक 10:  उन दैत्यों की तपस्या के प्रभाव से बहुत समय तक पीड़ित रहने के कारण विन्ध्य पर्वत से धुआँ निकलने लगा। यह एक आश्चर्यजनक बात थी ॥10॥
 
श्लोक 11:  उनकी घोर तपस्या देखकर देवतागण बहुत भयभीत हो गए। देवताओं ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए अनेक विघ्न उत्पन्न करने शुरू कर दिए।
 
श्लोक 12:  उसने बार-बार रत्नों और सुन्दर स्त्रियों के ढेर भेजकर उन्हें लुभाने की कोशिश की; लेकिन उपवास करने वाले उन महान राक्षसों ने अपनी तपस्या भंग नहीं की।
 
श्लोक 13-15:  तदनन्तर देवताओं ने उन दोनों महाबली दैत्यों पर पुनः माया का प्रयोग किया। उनकी बहनें, माताएँ, पत्नियाँ तथा माया द्वारा उत्पन्न अन्य सम्बन्धी दौड़कर वहाँ आते और कोई राक्षस भाला लेकर उन्हें बार-बार दौड़ाकर भूमि पर पटक देता। उनके आभूषण गिर जाते, वस्त्र खिसक जाते और केश खुल जाते। वे सब सम्बन्धी सुन्द और उपसुन्द को पुकारकर कहते - ‘बेटा! मुझे बचाओ, भैया! मेरी रक्षा करो।’ यह सब सुनकर भी वे दोनों महातपस्वी अपनी तपस्या से विचलित नहीं हुए; वे अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं कर सके॥13-15॥
 
श्लोक 16:  जब इन घटनाओं से उनमें से किसी को भी चिन्ता नहीं हुई और न किसी के हृदय में कोई पीड़ा हुई, तब वे मायावी स्त्रियाँ और राक्षस दोनों ही अदृश्य हो गए ॥16॥
 
श्लोक 17:  तब सम्पूर्ण जगत् के हितैषी भगवान ब्रह्माजी उन दोनों महादैत्यों के पास आये और उनसे अपनी इच्छानुसार वर मांगने को कहा॥17॥
 
श्लोक 18-20:  तत्पश्चात् बलवान एवं पराक्रमी दोनों भाई सुन्द और उपसुन्द भगवान ब्रह्मा को उपस्थित देखकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए और दोनों मिलकर भगवान ब्रह्मा से बोले - 'प्रभो! यदि आप हमारी तपस्या से प्रसन्न हैं तो हम दोनों ही सम्पूर्ण मायाओं को जानने वाले, अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता, बलवान, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और अमर हो जाएँगे।' 18-20॥
 
श्लोक 21:  ब्रह्मा ने कहा, "अमरता को छोड़कर तुम जो कुछ भी मांगोगे वह सब तुम्हें मिलेगा। मृत्यु का कोई और तरीका मांगो जो तुम्हें देवताओं के समान बनाए रखे।"
 
श्लोक 22:  तुम सबने यह महान तप इस संकल्प से किया है कि तुम तीनों लोकों के देवता बनोगे। इसीलिए तुम्हें अमर नहीं बनाया जा रहा है; क्योंकि अमरता तुम्हारी तपस्या का उद्देश्य नहीं थी ॥22॥
 
श्लोक 23:  हे दैत्यराजों! तुम दोनों ने तीनों लोकों पर विजय पाने के लिए ही यह तप किया था; इसलिए मैं तुम्हारी अमरता की इच्छा पूरी नहीं कर रहा हूँ॥ 23॥
 
श्लोक 24:  सुन्द और उपसुन्द बोले, 'पितामह! फिर मुझे यह वरदान दीजिए कि हम तीनों लोकों में एक-दूसरे के अतिरिक्त किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से मृत्यु का भय न रखें।
 
श्लोक 25:  ब्रह्माजी ने कहा- तुमने जो कुछ माँगा है, वह मैं तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम्हारी मृत्यु भी ठीक इसी प्रकार होगी॥ 25॥
 
श्लोक 26:  नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उन दोनों दैत्यों को यह वरदान देकर तथा उनकी तपस्या से निवृत्त कराकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोक को चले गये।
 
श्लोक 27:  तत्पश्चात् वे दोनों भाई, दैत्यराज सुन्द और उपसुन्द, अभीष्ट वर पाकर समस्त लोकों में अजेय हो गए और अपने घर लौट गए॥ 27॥
 
श्लोक 28:  उन दोनों वीरों को वरदान प्राप्त करके तथा अपनी मनोकामना पूर्ण करके लौटते देखकर उनके सभी सम्बन्धी बहुत प्रसन्न हुए।
 
श्लोक 29-30:  तत्पश्चात् उसने अपनी जटाएँ काटकर सिर पर मुकुट धारण कर लिया, बहुमूल्य आभूषण और स्वच्छ वस्त्र धारण कर लिए और ऐसा प्रकाश फैला दिया, मानो असमय ही चाँदनी फैल गई हो और दिन-रात एक समान हो गए हों। उसके सभी सम्बन्धी सदैव मौज-मस्ती में मग्न रहते थे।
 
श्लोक 31:  हर घर में 'खाओ, आनंद लो, बांटो, आनंद मनाओ, गाओ और पियो' ये शब्द हमेशा गूंजते रहते थे।
 
श्लोक 32:  यहाँ-वहाँ जोर-जोर से तालियों की ध्वनि से राक्षसों का सारा नगर हर्ष और प्रसन्नता में डूबा हुआ प्रतीत हो रहा था ॥32॥
 
श्लोक 33:  वे राक्षस, जो इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकते थे, वर्षों तक विभिन्न खेलों और मनोरंजनों में व्यस्त रहे; लेकिन पूरा समय उन्हें एक दिन के समान प्रतीत होता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)